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छोडता है कोई-कोई कुछ- कुछ।
जबकी छूटता है सबका सब कुछ।
अर्थात यदी कहीं कुछ स्वयं देना पड जाए तो हम कितने धर्म संकट में पड जाते है मन आगे बढने ही नहीं देता,कितना मुश्किल हो जाता है किसी को भी कुछ भी देना छोडने के लिए बहुत कम लोग ही आगे आ पाते हैं ओर वो भी कुछ थोडा सा ही निकाल पाते है ये भली-भांत जानते हुए कि ऐक दिन सब कुछ छूटना है ये ध्रुव सत्य है।
ये सच्चाई है कि संसार कि जिन-जिन वस्तुओं को हम जीवन के 60-70-80 या इस से भी अधिक वर्षो में पूरी-पूरी मेहनत कर के तरीके से या गैर तरीके से पाप या पुण्य को नजरअंदाज कर के अपनें लिए बडी रूचि से इकट्ठा कर रहे हैं या कर चुके हैं उन सभी वस्तुओं की अवशकता हम से अधिक हमारे निकटतम रिश्तेदारो को होती है जो भीतर से हमारी घंटी बजने का (मोत का)इंतजार कर रहे हैं ।हम इन बातों से अनभिज्ञ ये सोचकर जी रहे होते हैं कि ये सब हमारी सेवा में लगकर ईमानदारी से अपना रिश्ता निभा रहे हैं ।
कहने का तात्पर्य मात्र इतना है कि कलयुग की इस नाजुक घड़ी में बडी सावधानीपूर्वक संतुलन बनाते हुए ही जीवन को भली-भांत समझबूझ कर प्रभू की शरणागत होकर, ओर उनके निर्णयों को पूरे मन से स्वीकार कर जीवन यापन करना चाहिए।

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