विषय भोग -
जब जीव के अंदर कोई विषय जगता है तो व्यक्ति के पास दो विकल्प होते हैं या तो उस विषय का भोग करे अथवा त्याग दे लेकिन त्यागने के लिए संकल्प पक्का होना चाहिए परन्तु वो चंचल मन के चलते बहुत कठिन होता है,इसलिए मनुष्य चाह कर भी विषय को त्याग नहीं पाता ओर उस में बह कर अपनी बहुत बड़ी हानि कर लेता है।यही भोग की विशेषता है,कयोंकि
विषय भोगने से पहले अमृत के जैसे प्रतीत होते है जबकी वास्तव में काल कूट विष से कम नहीं है भोगने के बाद ही इसकी प्रतीती होती है।
कहने का तात्पर्य यह है कि किसी भी विषय का भोग हमें कभी भी पूर्णतः तृप्त नहीं कर सकता जबकि किसी विषय का त्याग अवश्य में हमें अमरत्व प्रदान कर पूर्ण संतुष्टी दे सकता है इस में लेष मात्र भी संशय नहीं।