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"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्"।

हे अर्जुन!जब -जब परमधर्म परमात्मा के लिए ह्रदय ग्लानि से भर जाता है,जब अधर्म की वृद्धि से भाविक पार पाते नहीं देखता,तब मैं आत्मा को रचने लगता हूँ ।

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