आरंभ
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हर किसी के भीतर
एक गीत सोता है
जो इसी का प्रतीक्षमान होता है
कि कोई उसे छूकर जगा दे

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सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय"

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