2005 में जब लोजपा के 29 विधायक जीते थे, तो न राजद न जदयू को समर्थन की रामविलास जी की जिद लंबी खिंचती जा रही थी. और, जब तक उन्होंने राबड़ी जी को समर्थन देने के लिए मना बनाया, तब तक नीतीश कुमार ने अपनी विशेषज्ञता का परिचय देते हुए चिर परिचित कुचक्र रच कर अपने लठैत नरेंद्र सिंह, बाबू जगदेव के क़ातिल रामाश्रय सिंह व नागमणि, आदि के ज़रिए पार्टी पर आघात करा दिया, और पासवान जी के विधायकों को JDU में भगा ले गए.
ख़याल रहे कि जिस बंगला में कभी 33 जन (29 एमएलए व 4 एमपी) रहा करते थे, उसको 2005 में नीतीश कुमार ने उजाड़ कर भूतबंगला बना दिया था.
रामविलास जी को पहला अटैक तभी आया था जब 2005 में उनके विधायकों की गाय-माल की तरह नीतीश कुमार ने ख़रीद-फ़रोख़्त की थी. ख़बर तो ये भी थी कि एक हॉस्पिटल में उनके हार्ट की जबरन सर्जरी की जा रही थी ताकि वे आगामी चुनाव से दूर किये जा सकें. जैसे ही भनक लगी, तो फौरन उस हॉस्पिटल को छोड़ कर इलाज के लिए वे दिल्ली आए.
अब कोई उसी दिन दहाड़े डाका डालने वाले नीतीश कुमार के चंगुल में स्वेच्छा से फंसने जा रहे, तो उस सूकून की प्रत्याशा में लगे व्यक्ति को ऊपर वाले 'राम' ही स्वाभिमान का मार्ग दिखाएं!
आज लोग भूल गए हैं कि पटना एयरपोर्ट के पास पासवान जी के ह्वीलर रोड स्थित प्रदेश कार्यालय को एविएशन डिपार्टमेंट के कुछ नियमों का हवाला देते हुए नीतीश कुमार ने हटवाने के लिए एड़ी चोटी एक कर दी थी. रामविलास जी कोर्ट गए, तो इनका दफ़्तर बचा. 2019 में भी रामविलास जी का अपमान किया था नीतीश कुमार ने उनके राज्यसभा जाने के वक़्त.
और कितना विकास चाहते हैं 'पुरुषोत्तम' 'नवीन' से!
नीतीश कुमार की कुंठा समझी जा सकती है. 77 में जब मधु लिमये के शब्दों में "ABCD" सब जीत के आ गये, तब भी नीतीश हार गए, 80 में भी पराजित हुए. इसलिए, लालू जी के सामने हमेशा अहसासे-कमतरी में चले जाते हैं. 89 में जब लालू जी की मदद से MP बने तो वीपी सिंह जी नेशनल फ्रंट की सरकार में मंत्री बनने के लिए शरद जी की कोठी का चक्कर नया-नया बंडी पहन के लगाते रहते थे कि सर हमारा ओथ कब करवाइएगा. उस समय रामविलास जी और शरद जी का जलवा था केंद्र में, तो उन दोनों के आगे भी इनफेरियरिटी कॉम्प्लेक्स में रहते थे. जब 2000 ई. में जोड़जुगत, जुगाड़, तिकड़म से CM बनने की बारी आई (महज 9 दिनों के लिए), तब भी अटल जी की पसंद पासवान जी थे. तो, मौक़ा मिलते ही नीतीश ने अपनी असुरक्षा के चलते रामविलास जी को पॉलिटिकली अलग-थलग करने का कुचक्र रच डाला. 2005 में मुख्यमंत्री बनते ही उनकी दलित समाज में पकड़ को कमज़ोर करने के लिए पासवान जाति को छोड़कर बाक़ी सभी दलित जातियों को महादलित में शामिल करने की चोचलेबाजी की.
और, जब 2017 में जनादेश लेकर नीतीश कुमार नागपुर भागे, तो पारस जी को मंत्री बनाया और उनकी जाति को भी महादलित कटैगरी में शामिल कर दिया. जब सारी दलित जातियाँ महादलित ही हो गईं, तो यह मोदी जी के पुनर्नामकरण संस्कार के ढकोसले के सिवा और क्या था? जबकि 2005-06 में ही पासवान जी ने महादलित शब्द पर आपत्ति करते हुए कहा कि यह ठीक वैसे ही है जैसे किसी को महाचांडाल कहा जाए!