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कभी सवालों के जवाब ढूँढता हूँ, कभी मसलों के हिसाब गिनता हूँ।फैली पड़ी है राख जले सपनों की यहाँ मैं नहीं इनमें मगर, बेवजह क्यूँ जलता हूँ ।

कभी गर्माहट बन तुझसे लिपटता हूँ,
कभी तुमसे बिछड़ कर मैं सिहरता हूँ।
बुने थे जो तुमने धागे रिश्तों के दरम्याँ,
मैं नहीं इनमें मगर, बेवजह क्यूँ ठिठुरता हूँ।

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