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@s.par.195d3

मनुष्य जन्म से ही ऋणी हो जाता है, जो कि है - भगवान ऋण, ऋषि ऋण अतः मातृ - पिता ऋण।
यदि इन सभी का ऋण चुकाने में हम असक्षम रहे तो व्यक्ति पर दोष लग जाता है। जैसे कि पितृ दोष:-
पितृ गण हमारे पूर्वज है जिनका ऋण हमारे ऊपर है। मनुष्य लोक से ऊपर पितृ लोक है। आत्मा जब अपने शरीर को त्याग कर सबसे पहले ऊपर उठती है तो वह पितृ लोक में जाती है। वहाँ हमारे पूर्वज मिलते हैं। जब किसी व्यक्ति का देहांत होता है तो उसके लिए ऊर्जा का सबसे बड़ा स्तोत्र उनके प्रति हमारी श्रद्धा है। और जब वे महसूस करते हैं कि हमारे परिवार के लोग न तो हमारे प्रति श्रद्धा रखते हैं और न ही इन्हें कोई प्यार या स्नेह है और न ही किसी भी अवसर पर ये हमको याद करते हैं,न ही अपने ऋण चुकाने का प्रयास ही करते हैं तो ये आत्माएं दुखी होकर अपने वंशजों को श्राप दे देती हैं,जिसे "पितृ- दोष" कहा जाता है | पितृ दोष निवारण के अनेक उपाय/टूने - टोटके है, परन्तु पितृ/पूर्वजों को प्रतिदिन या कभी - कभी याद करने से और दिल से उनका आदर/सत्कार करने से बड़ा उपाय और कुछ नहीं हो सकता। याद रहे की पितृ संध्या के समय सबसे ज़्यादा शक्तिशाली होते है और कहा जाता है कि पितृ रात के समय हमारे घर आते है। और हमेशा यही कोशिश करे कि सिर्फ पितृ ही नहीं बल्कि परम पिता परमेश्वर तथा अपने माता पिता को भी एक जैसा सम्मान दे।
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