आप लोगो के मन में कभी यह सवाल भी आता होगा के आत्मा को शरीर बदलने में कितना वक़्त लगता
है।आत्मा शरीर में रहकर चार स्तर से गुजरती है : छांदोग्य उपनिषद (8-7) के अनुसार आत्मा चार स्तरों में स्वयं के होने का अनुभव करती है- (1)जाग्रत (2)स्वप्न (3)सुषुप्ति और (4)तुरीय अवस्था।
तीन स्तरों का अनुभव प्रत्येक जन्म लिए हुए मनुष्य को अनुभव होता ही है, लेकिन चौथे स्तर में वही होता है जो आत्मवान हो गया है या जिसने मोक्ष पा लिया है। वह शुद्ध तुरीय अवस्था में होता है जहां न तो जाग्रति है, न स्वप्न, न सुषुप्ति ऐसे मनुष्य सिर्फ दृष्टा होते हैं- जिसे पूर्ण-जागरण की अवस्था भी कहा जाता है।
प्रथम तीनों अवस्थाओं के कई स्तर है। कोई जाग्रत रहकर भी स्वप्न जैसा जीवन जिता है, जैसे खयाली राम या कल्पना में ही जीने वाला। कोई चलते-फिरते भी नींद में रहता है, जैसे कोई नशे में धुत्त, चिंताओं से घिरा या फिर जिसे कहते हैं तामसिक।
कहने का मतलब यह है कि आत्मा जितनी जागृत होगी उसको मरते वक़्त भी अपनी मृत्यु का ज्ञान होगा और उसके लिए जन्म लेना मुश्किल हो जाएगा और जो आत्मा पूरी जिंदगी सोई रही उसका जन्म उसी वक़्त हो जाएगा।
इसीलिए हमेशा परमपिता के ध्यान में रहे और खुद को ज़्यादा से ज़्यादा प्रकृति से जोड़े।
धन्यवाद