हिंदू धर्म के धर्मग्रंथों में लिखा है कि आत्मा मूलतः मस्तिष्क में निवास करती है। मृत्यु के बाद आत्मा यहां से निकलकर दूसरे जन्म के लिए ब्रह्मांड में परिव्याप्त हो जाती है। कुछ वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध से इस बात की पुष्टि हुई है। मृत्यु के अनुभव पर वैज्ञानिकों ने शोध किए हैं। जो वर्तमान में भी चल रहे हैं।
मृत्यु को बहुत करीबी से महसूस करने वाले लोगों के अनुभवों पर आधारित दो प्रख्यात वैज्ञानिकों ने मृत्यु के अनुभव पर एक सिद्धांत प्रतिपादित किया है। प्राणी की तंत्रिका प्रणाली से जब आत्मा को बनाने वाला क्वांटम पदार्थ निकलकर व्यापक ब्रह्मांड में विलीन होता है तो मृत्यु जैसा अनुभव होता है।
भारत में सदियों से पारंपरिक रूप से यह माना जाता रहा है कि आत्मा का अस्तित्व होता है और श्राद्ध पक्ष में उनका आह्वान भी किया जाता है।
वेद में सृष्टि की उत्पत्ति, विकास, विध्वंस और आत्मा की गति को पंचकोश के क्रम में समझाया गया है। पंचकोश- 1.अन्नमय, 2.प्राणमय, 3.मनोमय, 4.विज्ञानमय और 5.आनंदमय। इन्हीं पंचकोश को ही पांच तरह का शरीर भी कहा गया है। वेदों की उक्त धारणा विज्ञान सम्मत है।