आरंभ
×

#गोमुत्र कटु तीक्ष्णोष्णम् सक्षारत्वान्न वातलम् ।
लध्विग्नदीपनं मेध्यंपित्तल कफावातनुत ।।

शूलगुल्मोदरानाह: विरेकास्थापनादिषु ।
मूत्रप्रयोगसाध्येषुगव्यमं मूत्रं प्रयोग जयेत् ।।

( #सुश्रृत संहिता सूक्त 45-220-21)

अर्थात #गाय का मूत्र कटूरस, तीक्ष, उष्ण, क्षार युक्त होने के कारण से #वायु नाशक है कारक नहीं । लघु, अग्निपरदीपक पवित्र मेधा, पित्तकारक कफ,...

और पढें ...

 टिप्पणियाँ 0
 बढ़िया 0
 लहरायें 0
 पसंदीदा 0




प्रयोग करें (Login)
~परिचर्चा से जुड़ें
  • विशिष्‍ट परिचर्चा
    #educratsweb    #88 लहरें
  • विशिष्‍ट परिचर्चा
    #Misc    #55 लहरें
  • विशिष्‍ट परिचर्चा
    #astrology    #48 लहरें
  • विशिष्‍ट परिचर्चा
    #Education    #44 लहरें
  • विशिष्‍ट परिचर्चा
    #prediction    #42 लहरें
  • विशिष्‍ट परिचर्चा
    #News    #39 लहरें
  • विशिष्‍ट परिचर्चा
    #hyderabadmuktisangram    #30 लहरें
  • विशिष्‍ट परिचर्चा
    #rashifal    #26 लहरें
@मित्र आमंत्रित करें

Get it on Google Play