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दोस्तों एक बात पुछू हम नें क्यों इतने सारे संघ,संस्थाऐं ,आप्स (जैसे - संवाद ,लहर)आचार्य राजीव दीक्षित जी के नाम से बना रखी हैं क्या हम सब संघ ,संस्थाऐं एक हो कर नहीं चल सकते ,जब उदेश्य एक ,लक्ष्य एक हैं तो ,और राह तो स्वंय आचार्य नें बाता हुई हैं (अपने व्यख्यान द्वारा ),मार्गदर्शक भी आचार्य हैं, तो क्यों हम सब एक हो कर नहीं चल सकते । अगर हम ऐसे ही अलग रहें तो ठीक वैसा ही परिणाम होगा कि जो बिखरी मोतीयों कि माला का होता हैं ,जिसा कोई मुल्य नहीं ,पर अगर हम एक होगऐं तो वह बहुमुल्य मोती कि माला होगी ,जिसकी चमक , सौंदर्य बहुत अदभुत होगा और जब हम एक होगें को वही सौंदर्य का अर्थ आचार्य का भारत होगा जिसकी हम सब कल्पना करते हैं
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