सभी को प्रणाम। क्या आप लोग जानते हो ? हमारे घर में जो आते हैं पुत्र और पुत्री के रूप में उनका कहीं ना कहीं हमसे कुछ पहले का संबंध भी होता है। याद करें अपने माता-पिता को दादा दादी को या नाना नानी को, तो क्या लगता है कि वह समाप्त हो गए या नहीं रहे ,नहीं ऐसा नहीं होता उनकी आत्मा किसी ना किसी रूप में अपने अंश को ढूंढ ही लेती हैं, और किसी ना किसी रूप में वह हमारे घर आ ही जाते हैं। अगर समझना चाहें तो हमारे पुत्र और पुत्री किसी ना किसी रूप में हमारे पूर्वजों का ही अंश होते हैं। साइंटिफिकली समझना है तो यूं कहिए कि नाना नानी दादा दादी के जींस हमारे बच्चों में आते हैं कोई ना कोई आदत अपने बच्चों में कई बार महसूस भी करते हैं। कभी कभी हम कहते भी हैं अरे यह तो अपने दादा पर गया है यह तो अपने नाना पर गया है । असल में हमारे बच्चे हमारे बुजुर्ग हैं हमें कोई भी व्यवहार करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि यह हमारे पूर्वजों की ही देन है जहां कठोर होना है वहां तो होना ही चाहिए लेकिन साथ में एक सम्मान श्रद्धा भी होनी चाहिए जो हम अपने पूर्वजों के प्रति श्राद्ध में ही रखते हैं । हमारी विशेष दिनों की श्रद्धा और रोज की श्रद्धा एक जैसे ही होनी चाहिए ।आप ऐसा करके देखिए आपको खूब आनंद आएगा और कहीं ना कहीं हमारा मैं पिघलेगा। धन्यवाद आपका हितेषी राकेश