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@rs636.e1733
Rakesh sharma
@rs636.e1733
सदस्यता Oct, 2020
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हम पुण्य करते हैं क्यों करते हैं? हम यह सोचते हैं इस पुण्य से हमारा लोक के साथ परलोक भी सुधरेगा। तो हमारे पुण्यों में हमारी इच्छा जुड़ जाती हैं । अब सवाल यह है कि कई बार ऐसी जगह मदद करनी होती है जो काउंट नहीं होगी तो फिर क्या उसका लाभ मिलेगा? हम सोचते हैं कि हमें कोई दिक्कत ना हो, हम से जुड़े लोगों को कोई दिक्कत ना हो, हमारा परलोक भी सुधर जाए, इसीलिए हम उन्हें करते हैं। लेकिन ऐसा सहयोग जो आपने किया और सचमुच आप भूल जाओ आपको याद ही ना रहे बस उतना ही प्रकृति आपके पुण्य...

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सभी को प्रणाम। क्या आप लोग जानते हो ? हमारे घर में जो आते हैं पुत्र और पुत्री के रूप में उनका कहीं ना कहीं हमसे कुछ पहले का संबंध भी होता है। याद करें अपने माता-पिता को दादा दादी को या नाना नानी को, तो क्या लगता है कि वह समाप्त हो गए या नहीं रहे ,नहीं ऐसा नहीं होता उनकी आत्मा किसी ना किसी रूप में अपने अंश को ढूंढ ही लेती हैं, और किसी ना किसी रूप में वह हमारे घर आ ही जाते हैं। अगर समझना चाहें तो हमारे पुत्र और पुत्री किसी ना किसी रूप में हमारे पूर्वजों का ही अंश होते...

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धन नहीं आया तो क्या हुआ ??? जन्मों तक इसके पीछे भागा हूं और मान मर्यादा ,प्रसिद्धि पाई भी है , लेकिन मिला क्या वही अंधेरे कायम हैं। अबकी बार परम पुण्य फल उदय हुआ है ना जाने कौन सा कि शुद्ध धर्म मिला ,सत्य धर्म, प्राकर्तिक धर्म, अब जन्मों की दौड़ ,भटकन को जैसे किनारा मिला, अब परवाह नहीं क्या मिलता है और क्या नहीं? सत्य पथ, जी होगा बेहतर ही होगा विश्वास कायम है। मंगल प्रभात।

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[05/11, 05:04] Rakesh Sharma: तुम थे ,जब तुम ही थे। थी कैसी प्रचंड वेदना तुम्हारे मन की। मैंने भी सुनी थी।में दौड़ा आया था,तुमने कितना स्नेह दिया था । तुम चले जब मैंने भी पैर उठाए,पर कहां घोड़ा और कहां मैं, फिर कैसा साथ ? में भ्रम में रहा और तुम तो धावक थे ना, तो दौड़ते ही चले गए । खूब दौड़े तुम। मैं अकेला अपनी मीठी मीठी यादों में ही दौड़ता रहा, अपने मन के घोड़ों के साथ। फिर कैसा साथ। अब भी खूब दौड़ता हूं। तुम मुहाने पर भी पहुंच गए। फिर भी तुम मिलते हो कभी कभी अच्छा लगता है तुम्हारा...

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मां ऐसा शब्द। जिससे बच्चा पहली बार म,म करके ही बोलने की क्रियाएं सीखता है । मां का वात्सल्य और प्रेम को शब्दों में बयान करना असंभव सा कार्य है। बड़ा अच्छा लगता है जब बड़ा होने के बाद हम मां के आंचल में कभी आकर बैठे , कभी उसके हाथ का बनाया भोजन ग्रहण करें। क्योंकि ऐसा करने से उस ईश्वरी सत्ता का राज इतनी आसानी से समझ आने लगता है । बात यह है इस प्रेम को हम क्या किसी पैमाने से नाप सकते हैं? जवाब है ,, जी नहीं । इस महमारी के दौरान मां की संगति ,मां के सानिध्य का,, प्रेम...

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आपने अक्सर देखा होगा और सुना भी होगा माता पिता अपने बच्चों को कहते हैं अरे इसे कुछ नहीं आता यह भोला है। बेटा चाहे बड़े बड़े इंस्टीट्यूट में जाकर ब्यूरोक्रेट को ट्रेनिंग दे रहा है,किसी भी बड़े पद पर हो। माता पिता के लिए सदैव वोह नन्ना मुन्ना ही बना रहता है। इससे एक बात सीखने को मिलती है हम कहीं भी हों, हमें सदैव अपने को सामान्य ही समझना चाहिए। जब हमें सिविल services या किसी अन्य बड़े बड़े एग्जाम की तैयारी करनी है। तब कोई दबाव नहीं लेना है। एकदम सामान्य रहना है और मन...

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