[05/11, 05:04] Rakesh Sharma: तुम थे ,जब तुम ही थे। थी कैसी प्रचंड वेदना तुम्हारे मन की। मैंने भी सुनी थी।में दौड़ा आया था,तुमने कितना स्नेह दिया था । तुम चले जब मैंने भी पैर उठाए,पर कहां घोड़ा और कहां मैं, फिर कैसा साथ ? में भ्रम में रहा और तुम तो धावक थे ना, तो दौड़ते ही चले गए । खूब दौड़े तुम। मैं अकेला अपनी मीठी मीठी यादों में ही दौड़ता रहा, अपने मन के घोड़ों के साथ। फिर कैसा साथ। अब भी खूब दौड़ता हूं। तुम मुहाने पर भी पहुंच गए। फिर भी तुम मिलते हो कभी कभी अच्छा लगता है तुम्हारा एहसास। पर हमारा मिलन कैसा ? छोर कभी मिलते थोड़े ही हैं । हां अगर दोनो मुड़ें एक दूसरे की तरफ तब। पर तुम बहुत दूर निकल गए में अभी वहीं हूं जहां से तुम चले थे। कल रात तुम सपने में आए, सपने में मेरे बहुत आए लेकिन जब उन्हें दूसरे सफर पर जाना होता है तब। तनिक देर को मिलने आते हैं। मेरा सफर तो हो ही न सका , मैं भी खूब चला पर आज भी वहीं हूं। मेरा सफर सच्चा नहीं था। मेरी वेदनाएं प्रभावी नहीं थी। मैं रुक गया और तुम बढ़ते ही गए। फिर मिलेंगे ऐ साथी किसी और सफर पर। और🔥उसी ज्वाला को में जीवित रखूंगा अपने भीतर। तुम अनजान बनकर आना मैं फिर पहचान लूंगा हमेशा की तरह तुमको।
[05/11, 05:04] Rakesh Sharma: खूब ऊर्जा के साथ आगे बड़ों भाई। सुखी हो प्रसन्न रहो, स्वस्थ हो।