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"भारत में रहने वाला और इसके प्रति ममत्व की भावना रखने वाला मानव समूह एक जन हैं |उनकी जीवन प्रणाली,कला,साहित्य,दर्शन सब भारतीय संस्कृति है|इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद का आधार यह संस्कृति है इस संस्कृति में निष्ठा रहे तभी भारत एकात्म रहेगा"-पंडित दीनदयाल उपाध्याय #पंडित_दीनदयाल_जयंती

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विविधता में एकता और विभिन्न रूपों में एकता की अभिव्यक्ति भारतीय संस्कृति की विचारधारा में रची- बसी हुई है- पंडित दीन दयाल उपाध्याय #पंडित_दीनदयाल_जयंती

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यहाँ भारत में, व्यक्ति के एकीकृत प्रगति को हासिल के विचार से, हम स्वयं से पहले शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा की चौगुनी आवश्यकताओं की पूर्ति का आदर्श रखते हैं - पंडित दीन दयाल उपाध्याय #पंडित_दीनदयाल_जयंती

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यह जरूरी है कि हम ‘हमारी राष्ट्रीय पहचान’ के बारे में सोचें इसके बिना ‘आजादी’ का कोई अर्थ नहीं है-- पंडित दीन दयाल उपाध्याय #पंडित_दीनदयाल_जयंती

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भारत के सामने समस्याएँ आने का प्रमुख कारण, अपनी ‘राष्ट्रीय पहचान’ की उपेक्षा है - पंडित दीनदयाल उपाध्याय #पंडित_दीनदयाल_जयंती

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आजादी केवल तभी सार्थक हो सकती है, जब यह हमारी संस्कृति की अभिव्यक्ति का जरिया बनती है- पंडित दीनदयाल उपाध्याय #पंडित_दीनदयाल_जयंती

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जीवन में विविधता और बहुलता है फिर भी हमने हमेशा उनके पीछे एकता की खोज करने का
प्रयास किया है - पंडित दीनदयाल उपाध्याय #पंडित_दीनदयाल_जयंती

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जब अंग्रेज हम पर राज कर रहे थे, तब हमने उनके विरोध में गर्व का अनुभव किया, लेकिन हैरत की बात है कि अब जबकि अंग्रेज चले गए हैं, पश्चिमीकरण प्रगति का पर्याय बन गया है| - पंडित दीनदयाल उपाध्याय #पंडित_दीनदयाल_जयंती

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विविधता में एकता और विभिन्न रूपों में एकता की अभिव्यक्ति, भारतीय संस्कृति की सोच रही
है - पंडित दीनदयाल उपाध्याय #पंडित_दीनदयाल_जयंती

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दीनदयाल जी का आर्थिक चिंतन भारत की तत्कालीन वास्तविकताओं पर आधारित था । वे मनुष्य से मनुष्य के बीच बनावटी संबंधो से संतुष्ट नहीं थे ।उनका मानना था कि एक तरफ शोषण,गरीबी, भुखमरी हो और दूसरी तरफ अर्थतन्त्र का एकाधिकार हो वहाँ मनुष्य का सम्पूर्णविकास केवल छल है। #पंडित_दीनदयाल_जयंती

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मानवीय ज्ञान सार्वजनिक संपत्ति है - पंडित दीनदयाल उपाध्याय #पंडित_दीनदयाल_जयंती

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भारतीय संस्कृति की मूलभूत विशेषता है कि यह एक एकीकृत समग्र रूप से जीवन पर दिखती है - पंडित दीनदयाल उपाध्याय #पंडित_दीनदयाल_जयंती

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धर्म बहुत व्यापक अवधारणा है जो समाज को बनाए रखने के लिये जीवन के सभी पहलुओं से संबंधित है -पंडित दीनदयाल उपाध्याय #पंडित_दीनदयाल_जयंती

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धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष (मानव प्रयास के चार प्रकार) की लालसा व्यक्ति में जन्मगत होता है और इनमें संतुष्टि एकीकृत रूप से भारतीय संस्कृति का सार है - पंडित दीन दयाल उपाध्याय #पंडित_दीनदयाल_जयंती

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पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने अपने मौलिक चिंतन, श्रेष्ठ लेखन, पत्रकारिता, प्रभावशाली वक्ता, संगठनकर्ता और जन जुड़ाव के माध्यम से अपनी अंतिम साँसों तक भारत वर्ष की अतुलनीय सेवा की| #पंडित_दीनदयाल_जयंती

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प. दीनदयाल नेहरू की कश्मीर नीति के कटु आलोचक थे। कश्मीर पर धारा 370 से लेकर 1966 में नेहरू द्वारा पाकिस्तान के साथ जल संधि पर हस्ताक्षर तक दीनदयाल जी समय-समय पर आगाह करते रहे| #पंडित_दीनदयाल_जयंती

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दीनदयाल जी निर्धन और अशिक्षित लोगों की उन्नति के लिए अंत्योदय की संकल्पना का सुझाव दिया। उनका कहना था “अनपढ़ और मैले कुचैले लोग हमारे नारायण हैं”। #पंडित_दीनदयाल_जयंती

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दीनदयाल जी देश की एकता और अखंडता के लिए सदैव समर्पित रहे । उनका मानना था कि राष्ट्र की निर्धनता और अशिक्षा को दूर किए बिना वास्तविक उन्नति संभव नहीं है #पंडित_दीनदयाल_जयंती

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स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविंद ने भारतीय ज्ञान परंपरा के माध्यम से भारत के पुनरुत्थान का जो सपना देखा था, उसकी ज्योति को जन-जन तक पहुँचाने, और बहुआयामी राष्ट्रवाद की अलख जगाने के लिए दीनदयाल उपाध्याय ने ‘एकात्म-मानववाद’ के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। #पंडित_दीनदयाल_जयंती

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एकात्म मानववाद एवं अंत्योदय के प्रणेता, महान विचारक व प्रखर राष्ट्रवादी पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की जयंती पर कोटि - कोटि नमन #पंडित_दीनदयाल_जयंती

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